Tuesday, 20 September 2016

जानिये क्यों नहीं की जाती जगत पिता ब्रह्मा जी की पूजा



जगत पिता ब्रह्मा से इस दुनिया का अस्तित्व है लेकिन फिर भी जगत रचियता की पूजा-अर्चना किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में नहीं होती क्या है राज?

जगत पिता ब्रह्मा जी की काया योगियों मुनियों जैसी कांतिमय थी। उनके इस मनमोहक रूप को देखकर स्वर्ग की चित्ताकर्षक सुंदर डील-डौल वाली मोहिनी नाम की अप्सरा उन पर कामासक्त हो गई। कैसे ब्रह्मा जी पर अपने रूप लावण्य का जादू चलाया जाए ऐसा विचार कर वह समाधी में लीन ब्रह्मा जी के समीप ही आसन लगाकर बैठ गई।

जब ब्रह्मा जी की तांद्रा टूटी तो उन्होंने मोहिनी से पूछा," देवी! आप स्वर्ग का त्याग कर मेरे समीप क्यों बैठी हैं?"

मोहिनी ने कहा," हे ब्रह्मदेव! मेरा तन और मन आपके प्रति प्रेममत्त हो रहा है। कृपया आप मेरा प्रेम स्वीकार करें।"

ब्रह्मजी मोहिनी के कामभाव को दूर करने के लिए उसे नीतिपूर्ण ज्ञान देने लगे लेकिन ब्रह्मा जी की बातों से मोहिनी की कामभावना और अधिक जागृत हो गई। वह ब्रह्मजी
 को अपनी ओर असक्त करने के लिए कामुक अदाओं से रिझाने लगी। ब्रह्मा जी उसके मोहपाश से बचने के लिए अपने इष्ट श्री हरि को याद करने लगे।

 उसी समय सप्तऋषियों का ब्रह्मलोक में आगमन हुआ। सप्तऋषियों ने ब्रह्मा जी के समीप मोहिनी को देखकर उन से पूछा," यह रूपवति अप्सरा आप के साथ क्यों बैठी है?"

ब्रह्मा जी बोले," यह अप्सरा नृत्य करते-करते थक गई थी विश्राम करने के लिए पुत्री भाव से मेरे समीप बैठी है।"

सप्तऋषियों को ब्रह्मा जी की बातों से अहंभाव की गंध आ रही थी। अत: उन्होंने अपने योग बल से ब्रह्मा जी की मिथ्य भाषा को जान लिया और मुस्कुरा कर वहां से प्रस्थान कर गए। ब्रह्मा जी के अपने प्रति ऐसे वचन सुनकर मोहिनी को बहुत गुस्सा आया।

मोहिनी बोली," मैं आपसे अपनी काम इच्छाओं की पूर्ति चाहती थी और आपने मुझे पुत्री का दर्जा दिया। अपने मन पर संयम होने का बड़ा घमंड है आपको तभी आपने मेरे प्रेम को ठुकराया। यदि मैं सच्चे ह्रदय से आपसे प्रेम करती हूं तो जगत में आपको पूजा नहीं जाएगा और आपका घमंड भी सदा के लिए खत्म हो जाएगा।"

No comments:

Post a Comment