गोकर्ण की कथा
सबकुछ होने के बाद भी आरमदेव दुखी थे क्यूंकि उनकी कोई संतान नहीं थी, एक बार वो नहीं के किनारे टहल रहे थे तो एक ऋषि को देख कर वो जाके उनके पैरो में गिर गए और बिलख के रोने लगे. जब ऋषि ने दुःख का कारण पूछा तो उन्होंने कह सुनाया और ये भी पूछा के पिछले जन्म के ऐसे कौन से कर्म थे जिसके कारण मेरे साथ ये हो रहा है. घर में एक गाय है उसके भी बछड़ा नहीं होता, एक पेड़ घर में लगा है पर उसपे भी आम नहीं लगते है.
ऋषि ने उसका भाग्य देखा और कहा की तुम्हे सात जन्मो तक संतान नहीं मिलेगी, ये सुनते ही आत्मदेव फिर रोने लगे और बोले में कुछ नहीं जानता मुझे बस ये पता है की आप सक्षम है और मुझे पुत्र दीजिये. ऋषि ने कहा की संतान से सुख नहीं मिलता है, पर फिर भी में तुम्हे ये फल देता हूँ जिसे अपनी बीवी को खिला देना और कहना की गर्भधारण के पश्चात सत्यवादी रहे, शुद्ध रहे और दिन में एक समय ही खाए तब तुम्हे सात्विक संतान मिलेगी.
आरमदेव ने वो फल अपनी पत्नी को देदिया पर पत्नी ने उसे सुबह खाने की बात कही, पत्नी ने सोचा की अगर में फल खाऊँगी तो में अपने हिसाब से नहीं रह सकुंगी, न ही में झूठ बोल पाऊँगी और न में भूखी रह सकती हूँ. इस कारण उसने अपनी बहिन से सलाह मांगी, बहिन ने कहा की ये फल तो गाय को खिलादो में पेट से हूँ और मेरे पहले से ही तीन बच्चे है में तुम्हे मेरा बच्चा दे दूंगी. तुम मेरे साथ चलो और बच्चा होने पर ले आना और आत्मदेवजी को कहना की ये बच्चा पैदा हुआ है, उसने वैसा ही किया.
जब बच्चा पैदा हुआ उसी दिन गाय को भी बच्चा पैदा हुआ, गाय से पैदा हुआ बच्चा इंसानी था बस उसके कान गायो के समान थे. दोनों की शिक्षा प्रारम्भ हुई, आत्मदेव की साली के बेटे का नाम धुंधकारी जबकि गाय से जन्मे बच्चे का नाम गोकर्ण रखा गया. धुंधकारी ने पढाई नहीं की और भोग विलासी रहा जबकि गोकर्ण ने अच्छी शिक्षा पाई और एक सात्विक ज्ञानी हुआ.
धुंधकारी बुरी संगत में पड़ा और जुआ शराब आदि कुसंगति में लिप्त हो गया, धीरे धीरे उसने आत्मदेव की साडी सम्पति खख कर दी. जब सब खाख हो गया तो धुंधकारी आत्मदेव का कमंडल ले गया और बोला आज तो इससे हो जायेगा पर कल अगर मुझे धन नहीं मिला तो में आपके हाथ पैर तोड़ दूंगा. धुंधकारी चला गया और आत्मदेव रोने लगे, तब गोकर्ण आये और उन्हें प्रवचन दिए जिसे सुनकर आत्मदेव का चैतन्य जग और वो वनवासी हो गए.
अगले दिन जब धुंधकारी आया तो पिता को न देख माँ से धन माँगा, जब माँ धुंधवती ने असमर्थता जताई तो बेटे ने माँ की पिटाई की और अगले दिन फिर आने और एहि करने की धमकी देके चला गया. धुंधवाती ने आत्महत्या कर ली तो गोकर्ण अकेले हो गए और वो भी तब करने लगे. धुंधकारी अपनी लत से परेशान था और अब वो अपनी 5 बीवियों को परेशान करने लगा जब उनका धन समाप्त हो गया तो वो चोरी करने लगा बड़ा चोर बन गया.
एक दिन उसने रोज की चोरी से पीछा छुड़ाने के लिए राजा के यंहा बड़ी चोरी की और धन घर में लाके छुपा दिया, जब 5 पत्नियों ने ये देखा तो सोचा की पकडे जाने पर हमें भी दंड मिलेगा इसलिए उन्होंने खुद ही अपने पति को मार दिया और घर में ही गाड़ दिया, धुंधकारी प्रेत बन गया और उसकी आत्मा भटकने लगी.
जब गोकर्ण को ये पता लगा तो वो घर आये और धुंधकारी का श्राद कर दिया, जब रात में गोकर्ण सो रहे थे तो उन्होंने धुंधकारी की भटकती आत्मा देखि तब वो सोचने लगे की श्राद्ध के पश्चात भी उसकी मुक्ति क्यों नहीं हुई. सुबह उन्होंने अपने गुरु से पूछा तो गुरु ने कहा की पापी व्यक्तियों की सिर्फ श्राद्ध से मुक्ति नहीं होती है, तब गोकर्ण ने मुक्ति का मार्ग पूछा इस पर गुरु ने उन्हें भगवत कथा का पाठ करने को कहा.
गोकर्ण ने कथा का आयोजन किया धुंधकारी की आत्मा कथा में सात दिन बैठी और कथा समाप्ति के साथ ही देवगन आये और उसे ले गए, तब गोकर्ण ने देवगणो से पूछा की सिर्फ उसे क्यों गांव के बाकि सभी ने कथा सुनी है उनकी मुक्ति क्यों नहीं हुई तब देव बोले बाकि सब कथा में बैठ खाने पिने और इधर उधर ध्यान भटका रहे थे, सिर्फ धुंधकारी ने ही कथा ध्यान पूर्वक सुनी और उसका कल्याण हुआ.


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