Thursday, 15 September 2016

जानिये सात्विक और तामसिक भोजन के प्रभाव को

जानिये सात्विक और तामसिक भोजन के प्रभाव को





एक कहावत है- ‘‘जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन’’।

शास्त्रों में परान्न ग्रहण को निषिद्ध कहा गया है, परान्न का अभिप्राय इस प्रकार है- शास्त्रीय दृष्टि से स्वयं, स्वपत्नी एवं स्वमाता के अलावा अन्य लोगों द्वारा पकाया हुआ अन्न परान्न होता है। परान्न निषेध का मुख्य उदेश्य  यह है कि कुसंस्कारित अन्न रस का दुष्परिणाम बुद्धि पर न हो। यदि स्वार्थी तथा दुष्ट लोंगो के घर में
कुछ समय गप-शप की जाए तो भी बुद्धि पर संस्कारो की छाप  पड जाती हैं। इसके विपरित मंदिर में आरती के समय उपस्थित रहकर तीर्थ प्रसाद ग्रहण करके वहां से बाहर निकलते ही मन में मंगल विचार उठतें है। इस प्रकार परान्न का हमारे मन पर किस प्रकार प्रभाव पड़ सकता है, वह आसानी से समझ मे आ जाता हैं।

यदि घर में कोई धार्मिंक कार्य हो तो कम से कम दो दिन पूर्व परान्न का निषेध करें। सप्तशती, गुरू चरित्र, भागवत सप्ताह, गायत्री जप एवं सूक्त आदि के पाठ के दो दिन पहले तथा दो दिन बाद तक परान्न पूर्ण रूप से वर्जित हैं। यदि जप-तप के समय कोई बाधा हो और होटल, ढाबां या रेस्टोरेंट का भोजन करना पड़े तो यह परान्ना नही माना जाता । क्योकि हम इस अन्न की कीमत चुकाते हैं।

लेकिन आज परान्न विषयक नियमों का पालन करना कठिन है। इतना ही नहीं, परान्न ग्रहण का निषेध इस कल्पना को कालबाह्म करता है। यदि परान्न ग्रहण के सभी नियमों का अनुशासनपूर्वक पालन न किया जाए तो कम कम इष्ट-अनिष्ट तथा उनके संकेतों का पालन अवश्य किया जाना चाहिए। कुछ लोग तस्करी, मद्य-मांस का व्यापार या अवैध तरीकों से धन प्राप्त करते हैं, ऐसे लोगों के यहां का अन्न कदापि नहीं खाना चाहिए। यदि उस घर से कुछ लेना जरूरी ही हो तो केवल दूध या फल लें।

मांसाहार की वर्जना क्यों ?

आधुनिकता के युग में दुर्भाग्य से मांसाहार एवं मदिरापान जीवन के अनिवार्यं अंग बन चुकें है। लेकिन शास्त्रों में मांसाहार तथा मदिरापान का केवल निषेध ही नहीं, बल्कि उनकी गिनती पापकृत्यों में की गई हैं। मांसाहारी प्राणियों के दांत व दाढें बडें मजबूत व नुकिले होते हैं परंतु मानव के दांत कम नुकीले होते है। इसकें अलावा मांस भक्षक प्राणियों और शाकाहारी प्राणी में फर्क यह है कि मांसाहारी प्राणी जीभ से पानी पीत है जबकि गाय, बकरी, एवं मनुष्य आदि शाकाहारी प्राणी होंठों से पानी पीते हैं।
अब तक किए गए शोधों के अध्ययन से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि आदमी की आंतो की आंकरिक संरचना तंतुयुक्त आहार, फल एवं साक- सब्जियों के लिए ही सक्षम हैं। मांसाहार एवं मत्स्याहार के लिए वे बिल्कुल सक्षम नहीं हैं। इसके अतिरिक्त शोधकर्ताओं के अनुसार मांसाहार के लिए मारे गए प्राणियों में छिपे रोग मानव शरीर पर शीघ्र कब्जा कर लेते हैं।
मांसाहारी मनुष्य में रोेग की तीव्रता शाकाहारी मनुष्य की अपेक्षा अधिक रहती हैं। मांसाहार स्वादविहीन खाद्य है जिसमें गरम मसाले एवं भरपूर तेंल डालकर उसका जायका बढा़या जाता हैं। यानी मूल में जो अप्राकृतिक है वह और अधिक अप्राकृतिक होता जाता हैं।

मांसाहार के विषय में एक बात यह भी है कि मांस बहुतांश में रूचिहीन होता हैं। आहार शास्त्र की दृष्टि से मानव को केवल स्वादिष्ट तथा रसयुक्त पदार्थ ही विहित है। स्वादिष्ट, कटु, तिक्त, कषाय, आम्ल एवं क्षार आदि विविध रसयुक्त पदार्थों का सेवन ही उसके लिए लाभदायक होता हैं तभी उसके स्वास्थ्य में संतुलन रह सकता है। मांस का कोई स्वाद नही होता है। उसमें मसाले और दूसरे  पदार्थ यथा प्याज, लहसुन आदि डालकर जायका उत्पन्न किया जाता है।

 वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी प्राणी का अंत होने के कुछ ही समय बाद उसके शरीर की सडन क्रिया शुरू हो जाती है। इस तरह मांस भी पेट में जाने पर मनुष्य के शरीर पर विपरित प्रभाव डालता है। इसके अलावा मांस भी पेट में जाने पर मनुष्य के शरीर पर विपरित प्रभाव डालता है। इसके अलावा मांस अपना गुण-धर्म भी मानव-शरीर में उतारता रहता हैं। जिस प्राणी का मांस होता है; उसके सस्कार, स्वभाव एवं प्रकृति मानव में उभरने लगती हैं।

विशेषतया नित्य बकरे का मांस भक्षण करने वाले व्यक्ति में अतिरिक्त काम वासना उत्पन्न होकर उसके द्वारा कोई दुष्कर्म होता है। ऐसे पाप कर्म करने वाले लोगों में मांस भक्षण करने वाले लोगों की संख्या अधिक होती हैं।

प्राणीजन्य पदार्थों में कोलेस्टरोल होते है। इससे ब्लडप्रेशर एवं हृदयघात  जैसे रोग सहज रूप से उत्पन्न होने की संभावना अधिक रहती है। मांसाहारी पदार्थों के सेवन से निकनले वाले आम्ल मू़़त्रपिंड, उदर एवं संधिवात आदि विकार उत्पन्न करते है। मांसाहार में से तुतंमय पदार्थ बाहर नहीं निकल पाते जिसके चलते मनुष्य में कब्ज व आंतो के रोग उत्पन्न होने की प्रबल संभावना रहती हैं।

मांसाहार का एक दुखद पक्ष यह भी है कि अस्सी-नब्बें मांसाहारी पदार्थों में कार्बोहाइड्रेटनही होता जबकि रक्त संचरण क्रिया के लिए अस्सी-नब्बे प्रतिशत आवश्यकता ऊर्जा कार्बोहाइड्रेट से ही मिलती है।

 इसके अतिरिक्त पूर्व में किए गए विश्लेषणों के अनुसार मांस से निकलने वाले यूरिक एसिड़ के कारण मधुमेह, अधरंग, आंत्रपुच्छ शोथ, संधिवात (जोडो़ का दर्द) तथा अपस्मार (पागलपन) आदि अनेक रोग तेजी से उत्पन्न होते है। शरीर के मूत्रपिंड यूरिक एसिड को बाहर निकालते रहते है। लेकिन मांस के सेवन  से बनने वाले अतिरिक्त यूरिक एसिड को मू़त्रपिंड भी बाहर निकालने में सक्षम नहीं होते हैं इसी कारण मनुष्य रोगी हो जाता है।

मांसाहारियों का दावा है कि मांसाहार से शरीर को पोषका द्रव्य मिलते है, परंतु यह भी सत्य है कि उससे भी अधिक पोषक द्रव्य दूध, केले, हरी तरकारियां एवं धान्यों से प्राप्त होते है।  इसके अतिरिक्त अनेक निरीक्षणों के बाद यह बात भी सिद्ध हुई है कि मांसाहार के साथ मदिरापान करने वाले व्यक्ति का मन अध्यात्म एवं परमार्थ में नहीं लगता। अतः कहा जा सकता है कि किसी भी दृष्टि से मांसाहार उचित नहीं है। अब तो पाश्चात्य जगत भी इस बात को स्वीकार करने लगा है कि मांसाहार उचित नहीं है, हालांकि वे इस कर्म को पाप की श्रेणी मे नही मानते है।
खिलाकर क्यों खाएं ?

भोजन केवल पेट भरने के लिए किया जाने वाला कार्य नहीं, बल्कि उसे साक्षात् ब्रह्म जानकर भक्षण करना, उसकी आराधना जैसी पवित्र कार्य
समझना चाहिए। जैसे पूजा-पाठ मे हाथ-पांव धोकर एवं स्वच्छ वस्त्र धारण करके आसन पर विराजमान होते है और मौन रहकर यथाविधि कार्य करते है। भोजन के समय भी वैसेे ही सब कार्य करने चाहिए।

पूजा-पाठ जैसे भगवद् उपासना में किसी अपवित्र वस्तु को पास नहीं आने दिया जाता है। वैसे ही भोजन के समय भी कोई अपवित्र वस्तु भोजन के कक्ष में नहीं आने देनी चाहिए। दुसरा विशेष नियम यह है कि मनंुष्य पहले ब्रह्मण के समस्त प्राणियों को खिलाए, इसके बाद स्वयं खाएं।

प्रत्येक गृहस्थ के यहां रोजाना पांच प्रकार से अनेक जीवो की हत्या होती हैं। जैसे चल्हे को जलाने पर, किसी वस्तु को कूटने पर, पीसने एवं फटकने पर अथवा पात्र रखने पर, साफ-सफाई करते समय। मरने वाले ये जीव इतने सुक्ष्म होते है कि आंखों से ओझल ही बने रहते है। नित्य हो जाने वाली इन हत्याओं के पापों के शमन के लिए शास्त्रों मे पंच महायज्ञ करने का विधान कहा गया है-पहला ब्रह्मयज्ञ (वेद आदि शास़्त्रों का पढना-पढाना), दूसरा पितृयज्ञ (पितरों का तर्पण करना), तीसरा देवयज्ञ (हवन आदि क्रिया करना), चैथा भूतयज्ञ (बलि आदि देना) और पांचवां अतिथियज्ञ(अभ्यागत की उदरपूर्ति करना)

यदि अन्न-धन से संपन्न जो मनुष्य देव, पितृ, अतिथि, विद्वान, अनाथ, भूखों और विधवाओं का भाग न निकालकर स्वयं अकेले ही भक्षण करता है, तो उसके हृदय में जठराग्रि के रूप मे अवस्थित परमात्मा  पहले तो भोजन को देखते ही अनिच्छा प्रकट करेगा, इतने पर भी सक्षम व्यक्ति अपने उदर को भरना चाहेगा, तो परमात्मा केवल उतने ही भाग को पचने देगा, जो कि उसके हिस्से का होगा। अतः गृहणी का यह कर्तव्य है कि वह पहले घर में सबको भोजन कराए और बाद में स्वयं खाएं। भोजन में जिसका जो भाग होता है, वह उसे किसी न किसी रूप में ले ही लेता है। यदि कुछ न बन सके तो व्यक्ति अपनी थाली में से गाय, कौवे और कुत्ते के नाम के ग्रास अवश्ष् ही निकाल दे।

भोजन के बारे में शास्त्रकारों का कथन है-अन्नं ब्रह्म इत्युपासीत्। अर्थात् अन्न ब्रह्म है, यह समझकर उसकी उपासका करनी चाहिए।

प्याज-लहसुन की वर्जना क्यों ?

वैसे तो जमीन के नीचे पैदा होने वाली सभी कंद पूर्णतः निषिद्ध हैं परंतु हिंदू धर्म में विशेषकर प्याज एवं लहसुन त्याज्य माने गए है। प्याज के सेवन से रक्त में उसका असर रहने तक मन में काम वासना के विकार मंडराते रहते है। प्याज चबाने के कुछ समय पश्यात वीर्य की सघनता कम होती है और गतिमानता  बढ जाती हैं। परिणमस्वरूप् विषय-वासना में वृद्धि होती हैं।

बरसात के दिनों में प्याज खाने से अपच एवं अजीर्ण आदि उदर विकार उत्पन्न हो जाते हैं फिर भी कुछ गुणों के कारण आयुर्वेद ने प्याज के और लहसुन का समावेश औषधि में किया है।

लहसुन हृदय रोग के लिए उपयुक्त होता है। शरीर में ज्वर आदि होने पर प्याज को घिसकर पेट एवं मस्तक पर लगाया जाता है तथा प्याज रस का सेवन किया जाता है  परतु धर्मशास्त्रों के अनुसार यदि इन पदार्थों का उपयोग निरंतर किया जाए तो ये संस्कार एवं विचार की दृष्टि से हानिकारक सिद्ध होते हैं।

पवित्र रसोईघर में प्याज-लहसुन का प्रयोग करने से वह अपवित्र मानी जाती है। ये परमात्मा के नैवेद्य मे पूर्णतः निषिद्ध हैं। धार्मिक अनुष्ठान-व्रत आदि अवसरों पर भोजन मे लहसुन-प्याज का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। से सभी बातें औषधि उपयोग के  अलावा निषेधात्मक संकेत देने वाली हैं। वैसे शरीर का अस्तित्व न मानने वाले कुछ संत प्याज की तरह के पदार्थों का निषेध नहीं मानतें। कारण कि उनका पंच-महाभौतिक शरीर उच्च स्तरीय विविध कोशों में रहता है। जिसके कारण उनके द्वारा सेवन की गई किसी वस्तु का प्रभाव उनकी र बुद्वि एवं मन पर नही पडता परन्तु सामान्य व्यक्ति ऐसी वस्तुओं से उत्पन्न होने वाली दुष्प्रभावों से नहीं बच सकता ।

भोजन के बाद करवट लेके क्यों लेटें ?

भोजन के बाद बाईं करवट लेना आवश्यक कहा गया है। इसका बहुत लाभ मिलता हैं। भोजन करने के बाद बाईं करवट लेटने से पीछे तीन कारण बताए गए हैं।

पहला, अन्न का कुछ देर जठर में ही रहना शरीर के लिए पथ्यकारक होता है। यहां से अन्न तरल होकर आंत के अगले भाग मे प्रविष्ट होता है। इससे पाचन अच्छी तरह होता हैं।

दूसरा कारण है- जठर के अगले हिस्से में पूरा अन्न जाने पर उसकी बाईं ओर स्थित आकुंचन-प्रसारण वाली जगह पर अन्न का दबाव पडता  हैं। दाईं ओर सोने से यह दबाव नहीं पडता।

तीसरा कारण है- बाएं नथुने से सूर्य नाडी़ ‘पिंगला’ एवं दाएं नथुन से चंद्र नाडी़ ‘इडा़’ बहती रहती है। दाईं ओर लेटने से पिंगला एवं बाईं ओर लेटने से इडा़ नाडी़ चलती रहती है। शरीर विज्ञान के अनुसार अन्न पाचन के लिए पिंगला का स्वर चलना माना गया हैं इसलिए भोजन के बाद बाईं ओर कम से कम एक घंटा बाईं करवट अवश्स लेटें।

आचमन का औचित्य क्यों ?

हिंदू परम्परा में आचमन सभी प्रकार के सद्कर्मों की अति महत्वपूर्ण क्रिया है। यह क्रिया केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि आरोग्य शास्त्र की दृष्टि से भी इसका बडा महत्व है। लोटा भर पानी एक सांस मे पीने की अपेक्षा थोडा-थोडा जल घूंट- घूंट करके लेते रहने से वह बडा ही लाभदायक तथा व्याधि नाशक बन जाता है। आचमन के लिए बाएं हाथ की गोकर्ण मुद्रा में थोडा-सा जल लेकर ग्रहण किया जाता है।

गोकर्ण मुद्रा बनाते समय तर्जनी को मोड कर अंगूठे को दबा देना चाहिए। उसके बाद मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठका को परस्पर इस प्रकार जोड़कर मोड़ें कि हाथ की आकृति गाय के कान जैसी बन जाए। आचमन के लिए ब्रह्मतीर्थ का उपयोग किया जाता हैं। हथेली के कर्लाइं के पास का हिस्सा ब्रह्मतीर्थ है। यहां होंठ टिकाकर हथेली पर रखा जल ग्रहण करने की क्रिया तीन बार करें। चैथी बार बाएं हाथ के ब्रह्मतीर्थ के ऊपर से एक पली पानी थाली में छोडें। यह क्रिया आचमन कहलाती हैं।

आचमन के विषय में ‘स्मृति ग्रंथ’ में कहा गया है कि आचमन क्रिया करने से हर बार एक-एक वेद की तृप्ति प्राप्त होती है। प्रथम बार में ऋग्वेद की, दूसरी बार में यजुर्वेद की और तीसरी बार सामवेद की । प्रत्येक कर्म के प्रारंभ में आचमन करने से मन, शरीर एवं कर्म को प्रसन्नता प्राप्त होती हैं।

इसका एक और सबसे बडा़ लाभ है कि आचमन करके अनुष्ठान या कोई कार्य प्रारंम्भ करने से छींक, डकार तथा जंभाईं जैसे उपद्रव आमतौर पर नहीं होते या कम होते है। आचमन किए बिना किया गया कर्म निष्फल होता हैं इस मान्यता के पीछे यही उदेश्य है।

‘मनु स्मृति’ मे  कहा गया है कि निद्रा से जागने के बाद, भूख लगने पर, भोजन ग्रहण करने के बाद, छींक आने पर, असत्य भाषण होने पर, पानी पीने के बाद तथा अध्ययन करने के बाद आचमन अवश्य करें । इन बातों का सूक्ष्म निरीक्षण करने पर यह सिद्ध होता हैं कि इन प्रसंगो पर लार ग्रन्थि से लार रस निकलता रहता है। ऐसे वक्त आचमन करने से शरीर पर उसका दुष्परिणाम नहीं होता । भोजन के बाद किए गए आचमन से भरपूर लार रस पेट में जाता है जिससे अन्ना का पाचन होता हैं।

शरीर में विविध वायु विकार जैसे- डकार, हिचकी, छींक या अपान वायु उत्पन्न होने, भोजन करने के बाद मल-मूत्र विसर्जन के बाद या वीभत्य दर्शन आदि प्रसंगो पर भी आचमन करने का विधान शास्त्रों में किया गया है। परंतु हर विकार के समय आचमन करना संभव नही हो पाता है। ऐसे में जलाचमन के स्थान पर अपने बाएं कान का स्पर्श कर  ले। यदि ऐसा करने में भी किसी तरह की कोईं दिक्कत हो तो श्री हरि विष्णु का मन में स्मरण करें।


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