Friday, 23 September 2016

जानिए स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज { गुरूजी } के बारेमे...

Hindi Devotional & Spiritual • धार्मिक विशेषतायें
  स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज

स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज पूर्ण रूप से आत्मा की ज्योति से पूरिपूर्ण हैं। आनंद, पवित्रता और पुण्य की आभा से परिपूर्ण स्वामी अवधेशानंद गिरी जी hindu dharm  की साक्षात् मूर्ति हैं, श्री अवधेशानन्द गिरि महाराज , जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर , हजारों लोगों के लिए एक गुरु और लाखों लोगों के लिए एक प्रेरणा है स्वामी अवधेशानंद गिरी जी का जन्म कार्तिक पूर्णिमा के दिन एक विद्वान ब्राह्मण परिवार में हुआ। बालपन में उन्हें न खिलौनों में दिलचस्पी थी, न दोस्ती आदि में। अपने परिजनों से अकसर वह पूर्व जन्म की घटनाओं की चर्चा करते थे। ढाई साल की उम्र से उन्होंने बैराग धारण कर घर छोड़ दिया था, मगर परिवार के लोग समझा बुझाकर घर ले आये। जब वे हाई स्कूल की नौवीं कक्षा में थे तब yog के क्षेत्र में एक साधु की सिद्धियो का साक्षी बनने का  पहली बार अवसर मिला |
गर्मियों की छुट्टियों के दौरान उस वर्ष स्वामी जी आध्यात्मिक अध्ययन और योग का अभ्यास के लिए कुछ समय बिताने एक आश्रम का चले गए । एक रात के बीच में इस आश्रम में, उन्होंने  लगभग एक फुट जमीन के ऊपर हवा में उड़ते एक योगी देखा,
आश्रम के अधिकारियों को जब इस युवा लड़के के बारे में पता चला की उसने सिद्ध योगी की साधना को देख लिया है तो उनको दुबारा ऐसा न करने को चेताया, परन्तु उस सिद्ध योगी ने कहा कि इस बच्चे ने क्या गलत किया है ? वैसे भी एक साधु बनने जा रहा है। इस तरह उन्होंने पहले ही बता दिया था की ये भी आगे चल कर सिद्ध गुरु ही बनेगे |
कालेज में उनकी सक्रियता वाद-विवाद, कविताओं अथवा प्रार्थना आदि में होती थी। सन् 1980  में हिमालय की कंदराओं में उन्होंने गहन साधना की और इसके साथ ही उन्होंने संन्यास जीवन में पूरी तरह से कदम रखा। हिमालय के निचले पर्वतमाला में महीनो भटक कर उन्होंने पाया की उन्हें मार्गदर्शन करने के लिए एक गुरु की आवश्यकता है । इसी दौरान उनका स्वामी अवधूत प्रकाश महाराज  से मिलना हुआ जिन्होंने अपने आपको खोज लिया था और योग में विशेषज्ञ, और वेद और अन्य the hindu religion  के बारे में ज्ञान में बहुमुखी हो चुके थे , अवधेशानन्द जी भगवन मिल गए हो मानो, वही से उनकी स्वयं से मिलान की यात्रा की शुरुआत हुई


 महाराज कहते है की मनुष्य की यात्रा ईश्वर होने तक की यात्रा है. हम अपने-अपने रास्तों में कुछ भी बनते चले जायें पर हमारी पूर्णता ईश्वर हो जाने में है और धरती पर आते ही हमें ईश्वर होने के सभी साधन भी मिल जाते हैं. उन साधनों को पहचाने बिना पूर्णता की यात्रा हमेशा अधूरी रह जाती है. स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज ने different indian cultures को परिभाषित करते हुये कहा कि वह प्रत्येक वस्तु में वैभव को खोज लेती है. यह संस्कृति प्रत्येक पदार्थ को आदर देते हुये उसे प्रसाद बना लेती है ।

स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज के वचन :-
 इंसान वैसा ही बनता है जैसा वह सारे दिन सोचता है। जो विचार आप अपने मस्तिष्क में रखते है, वो ही सारे विचार अवचेतन मन में जा कर आपको वैसी ही प्रतिक्रिया देने लगते है, और वो शारीरिक व भौतिक रूप में प्रकट हो जाते है। हमारा अवचेतन मन बड़ा शक्तिशाली है, पर अच्छे-बुरे में फर्क करना और तर्क करना उसका स्वभाव नहीं है। हमारा अवचेतन मन निष्पक्ष और अपरिवर्तनीय है। यह न व्यक्तियों में भेद करता है न ही किसी तरह के धार्मिक पंथ या संस्था में। यह न तो दयालु है और न ही प्रतिशोधात्मक। यह तो आप अपने या दूसरों के बारे में जिस तरीके से सोचते है, महसूस करते है, और काम करते है, वही अंततः आपकी ओर लौटाता है। अब आपको सोचना है कि हमें अपने अवचेतन मन की शक्ति का कैसे उपयोग करके अपने जीवन के दुखों और रोगों से मुक्त होना है। पहले यह सुनिश्चित करें कि नकारात्मक, असफलता-वादी, बुरे या निराशाजनक विचारों को आपको दोहराना नहीं है। अगर वह याद भी आते है तो उनको सकारात्मक विचार लाकर दूर करना है...।
🌿 पूज्य आचार्यश्री जी ने कहा - संसार की दशा बड़ी विचित्र है। धरती पर स्थान तो बहुत है, मगर उदारता में कमी आ गई है। लोभ की प्रवृत्ति बढ़ रही है। स्वयं के भोग में चाहे जितना खर्च हो जाए, उसका कष्ट नहीं होता, किसी की सहायता करने में थोड़ा भी बहुत लगता है। ऐसी प्रवृत्ति के चलते ही हम ना अपना उद्धार कर पाते है और न ही औरों का। हमें भी समय के साथ अपने विचारों में, अपने आप में परिवर्तन लाना होगा, तभी हमारा जीवन सार्थक सिद्ध हो सकेगा और हम भगवान के घर जाने की एक सीढ़ी को और आसानी से पार कर पाएँगे। यह फूल सा जीवन क्षणभंगुर है। इस जीवन को फूल की ही तरह अपनी सुगंध बांटते हुए परहित में लगाना है। पता नहीं कब जीवन की सांझ हो जाए। परोपकार से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है। लेकिन हमारी इच्छा रहती है कि मैं ही सुखी रहूं और मेरा ही परिवार सुखी रहे। इससे आगे हम नहीं सोचते। हमारे सुख में जो सहायक बने हैं, उनके सुख की चिंता तो हमें रहती है, लेकिन बाकी की चिंता नहीं। दूसरों के प्रति अच्छा और सहायक दृष्टिकोण रखकर हम वास्तव में अपनी मदद करते हैं। अपने अहम को भूलकर ही हम आनंदस्रोत बन सकते हैं।

🌿 पूज्य आचार्यश्री जी ने कहा - प्रकृति को वही लौटाने की आदत है, जो आप उसे देते हैं; अतः प्रतिपल शुभ - श्रेयस्कर श्रेष्ठ और हितकर बीजवपन के अभ्यासी बनें। जब साइनायड जैसे पदार्थ में इतनी ताकत है कि इसका अल्पांश भी जिभ्या पे लग जाए तो प्राणों का संतुलन लड़खड़ा जाता है। जिभ्या बोल नहीं पाती, अकड़ जाती है, तब संत से प्राप्त ज्ञान में क्या ताकत नहीं होगी। एक छोटी सी गोली आपको नींद में ले जाती है। जब विषैली वस्तु ऐसी हैं तब ज्ञान में भी कोई ताकत तो ज़रूर होगी। अनुशासन शिष्य का सहज धर्म है। केन्द्रस्थ, लयबद्ध, संकल्पवान व्यक्ति ही गुरु के दिए गए अनुशासन को स्वीकार, शिरोधार्य कर सकता है। ऐसे ही व्यक्ति के अन्दर विकसित होती है, जानने की क्षमता। पूज्यश्री जी ने कहा - जब कोई पर्वत की ऊँची चोटी से जोर से आवाज लगाता है तो वही आवाज वापस लौटकर उसी को सुनाई देती है। विज्ञान मे इस घटना को Echo कहते है, पर यही नियम हमारे जीवन मे भी लागू होता है। हम वही पाते हैं। जो हम दूसरों को देते है। हम जैसा व्यवहार दूसरो के लिये करते है वही हमें वापस मिलता है। यदि हम दूसरों का सम्मान करते हैं तो हमे भी सम्मान मिलेगा। यदि हम दूसरों के बारे मे गलत भाव रखेँगे तो वो वापस हमें ही मिलेगा। अत: आप जैसा भी व्यवहार करें, याद रखिये कि वो लौटकर आपको ही मिलने वाला है...।




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