Friday, 23 September 2016

एक ऐसा मंदिर जहा चढ़ाई गयी थी कई अंग्रेज सैनिकों कि बलि

                                   एक ऐसा मंदिर जहा चढ़ाई गयी थी कई अंग्रेज सैनिकों कि बलि  

अपने आप में अलौकिक है ये मंदिर। ऐसी मान्यता है कि मां महाकाली के रूप में यहां विराजमान जगराता माता तरकुलही पिंडी के रूप में विराजमान हैं। इस पिंडी को महान क्रांतिकारी बाबू बंधू सिंह के पूर्वजों ने स्थापित किया था। बंधू सिंह ऐसे व्‍यक्ति थे, जो अंग्रेजों की बलि देने के बाद इसी पिंडी पर उनका रक्त चढ़ाते थे। ऐसा करने से उन्हें अलौकित शक्ति का एहसास होता था।

चौरी-चौरा की क्रांतिकारी धरती


चौरी-चौरा की क्रांतिकारी धरती से 5 किलो मीटर कि दुरी पर स्थित हैं यह अलग तरह का एकमात्र मंदिर। तरकुलहा देवी मंदिर हिन्दू भक्तों के लिए प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। तरकुलहा देवी मंदिर गोरखपुर से 20 किलो मीटर कि दूरी पर स्थित है। यह मंदिर अपनी दो विशेषताओ के कारण काफी प्रशिद्ध हैं।

क्रांतिकारी बाबू बंधू सिंह का इतिहास :-यह बात 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम से पहले की है। इस इलाके में जंगल हुआ करता था। यहां से से गुर्रा नदी होकर गुजरती थी। इस जंगल में डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह रहा करते थे। नदी के तट पर तरकुल (ताड़) के पेड़ के नीचे पिंडियां स्थापित कर वह देवी की उपासना किया करते थे। तरकुलहा देवी बाबू बंधू सिंह कि इष्ट देवी थी।

खून खौल उठता 

उन दिनों हर भारतीय का खून अंग्रेजों के जुल्म की कहानियां सुन सुनकर खौल उठता था। जब बंधू सिंह बड़े हुए तो उनके दिल में भी अंग्रेजो के खिलाफ आग जलने लगी। बंधू सिंह गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे, इसलिए जब भी कोई अंग्रेज उस जंगल से गुजरता, बंधू सिंह उसको मार कर उसका सर काटकर देवी मां के चरणों में समर्पित कर देते ।

अंग्रेज सिपाही बंधू सिंह के शिकार

पहले तो अंग्रेज यही समझते रहे कि उनके सिपाही जंगल में जाकर लापता हो जा रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें भी पता लग गया कि अंग्रेज सिपाही बंधू सिंह के शिकार हो रहे हैं। अंग्रेजों ने उनकी तलाश में जंगल का कोना-कोना छान मारा लेकिन बंधू सिंह उनके हाथ न आये। इलाके के एक व्यवसायी की मुखबिरी के चलते बंधू सिंह अंग्रेजों के हत्थे चढ़ गए।

फांसी की सजा

अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया जहां उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी, 12 अगस्त 1857 को गोरखपुर में अली नगर चौराहा पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया गया। बताया जाता है कि अंग्रेजों ने उन्हें 6 बार फांसी पर चढ़ाने की कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं हुए। इसके बाद बंधू सिंह ने स्वयं देवी मां का ध्यान करते हुए मन्नत मांगी कि मां उन्हें जाने दें।

बंधू सिंह का स्मारक

कहते हैं कि बंधू सिंह की प्रार्थना देवी ने सुन ली और सातवीं बार में अंग्रेज उन्हें फांसी पर चढ़ाने में सफल हो गए। अमर शहीद बंधू सिंह को सम्मानित करने के लिए यहां एक ममभी बना हैं।

 यहाँ की विशेषता है यहां मिलने वाला मटन का प्रसाद

यह देश का इकलौता मंदिर है जहां प्रसाद के रूप में मटन दिया जाता हैं। बंधू सिंह ने अंग्रेजो के सिर चढ़ा के जो बाली कि परम्परा शुरू करी थी वो आज भी यहां चालु हैं। अब यहां पर बकरे कि बलि चढ़ाई जाती है उसके बाद बकरे के मांस को मिट्टी के बरतनों में पका कर प्रसाद के रूप में बाटा जाता हैं साथ में बाटी भी दी जाती हैं।

बलि कि परम्परा

वैसे तो पुराने समय में देवी के कई मंदिरो में बलि कि परम्परा थी लेकिन समय के साथ साथ लगभग सभी जगह से यह परम्परा बंद कर दी गयी लेकिन तरकुलहा देवी के मंदिर में यह अब भी चालु है हालांकि इस पर अब काफी विवाद है और इसे बंद कराने के लिए कोर्ट में केस भी चल रहा हैं।

साल में एक बार मेला भरा जाता हैं

तरकुलहा देवी मंदिर में साल में एक बार मेला भरा जाता हैं जिसकी शुरुआत चेत्र रामनवमी से होती हैं यह मेला एक महीने चलता हैं। यहां पर मन्नत पूरी होने पर घंटी बांधने का भी रिवाज़ हैं, यहां आपको पूरे मंदिर परिसर में जगह जगह घंटिया बंधी दिख जायेगी।

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